भारतीय संस्कृति में विवाह सम्बन्ध और गोत्र विधान
ॐ नमःश्री गणेशाय
हमारी संस्कृति में विवाह सम्बन्ध की स्थापना का बहुत महत्व है,इससे नव दम्पत्ति गृहस्त आश्रम में प्रवेश करते है,वैदिक शास्त्रों में यह यह सर्वोपरि माना गया है
यथा नदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम् ।
तथैवाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम् ॥ ९० ॥ मनु स्मृति(6-90)
इसी लिए सगोत्र ओर सपिंड गोत्र में विवाह सम्बन्ध निषिद्ध माना गया है।
महृषि दयानंद जी ने समझाया है क्षत्रियः आर्यो को जैसे पानी मे पानी मिलने से विलक्षण गुण नही होता वैसे ही एक गोत्र पिता या माता कुल में विवाह होने से धातुओं में अदल बदल न होने से उन्नति कभी नही होगी विकृति होगी
सत्यार्थ प्रकाश का चतुर्थ समुल्लास
असपिंडा च या मातु रस गोत्रा च या पितृह ।
सा प्रशास्ता इव हिं देवाः दार कर्मणि मैथुने ॥ ५ ॥ (मनु स्मृति 3—5)
अर्थात जो कन्या माता के कुल की छः पीढियो में न हो और पिता की न होउसी कन्या से विवाह करना चाहिए
*सगोत्र व सपिंड गोत्र में विवाह सम्बन्ध सामाजिक परम्परा ओर मनोवैज्ञानिक जीव वैज्ञानिक और डीएनए की दृष्टि से त्रुटी पूर्ण होते है इनका परिणाम किसी भी दृष्टि से सुखद हो ही नही सकेगा, महापुरुषों ओर ऋषि मुनियो के वैज्ञानिक आधार पर हमारे पुरखो ने यह परम्परा स्थापित की थी कि रोहिल क्षत्रियः समाज उन आदर्शो को मानते हुए ही वैवाहिक सम्बन्ध करेंगे और आज तक करते आ रहे है,की माता के गोत्र की कन्या से विवाह नही करेंगे और पिता के गोत्र की कन्या या वर से विवाह नही करेंगे
यथा गोती सो भाई बाकी असनायी
यही कहावत सदियों से चली आ रही है माता के भाई की बेटी बहन हुई ,मामा की बेटी बुवा की बेटी बहन हुई ,अर्थात माँ का गोत्र छोड़ कर अन्य गोत्र की कन्या से विवाह स्वीकार्य ओर सुखकारी होता है।
रोहिले राजपूतो में यह सुखकारी सर्व हितकारी मान्यता बरकरार रहे पुरखो की देन उनकी बनाई गई वैधानिक वैज्ञानिक वैवाहिक रीत चलती रहे और समाज मे भ्रम न फैले कोई दिग्भ्रमित न हो किसी उद्देश्य से,अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रियः विकास परिषद रजिस्टर्ड सम्बद्ध अखिल भारतीय क्षत्रियः महासभा समय समय पर रोहिले राजपूतो/क्षत्रियों के आज तक खोजे गए लगभग 200 गोत्रों की सूचियों को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया व प्रिंटिड मीडिया पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से आप तक पहुंचाती रही है ताकि किसी को कोई दिक्कत न आये।परिषद की वेबसाइट पर भी यह लिस्ट उपलब्ध है,सगोत्र का अर्थ अपने पिता के गोत्र ओर सपिंड गोत्र का अर्थ वर व कन्या की माता के गोत्र से है इन गोत्रो को अवश्य छोड़ना है परन्तु दिल्ली शालीमार क्षेत्र की कुछ रोहिला विलगीत अन्य टाँकादि जातियों के सम्मेलन में 7 अप्रैल को आपने साथ रोहिला शब्द का इस्तेमाल करके माता के गोत्र को भी छोड़ के माता के गोत्र की कन्या से विवाह करने के प्रस्ताव पर तालिया बजा दी और दिल्ली और हरियाणा के अखबारों में छपवा दिया कि माता के गोत्र की कन्या से विवाह करना उचित रहेगा तथा कन्याओं की कमी पूरी होगी
जबकि वहाँ पर राष्ट्रीय स्तर से रोहिला राजपूत/,क्षत्रियः संगठनों के धोखे से बिना इस एजेंडे को बताए बुलाये गए जन प्रतिनिधियो ने विरोध कर इसे सामाजिक विकृति बताया तो उनके एक नही सुनी और मंच पर बोलने से रोका गया,अतः एतद द्वारा सभी रोहिला क्षत्रियः जन को सूचित हो कि उत्तर प्रदेश के किसी संगठन का इस वक्तव्य से कोई सम्बन्ध नही है जो अखबारों में छपवाया गया और व्हाट्स एप के जरिये वायरल किया गया। हम इसका विरोध व निंदा भृर्तस्ना करते है
अपने पुरखों की परंपरा हम नही तोड़ेंगे और विवाह के लिए माँ के गोत्र की कन्या से नाता नही जोड़ेंगे
जय भवानी
जय माँ शाकुम्भरी
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